लहान मुले व गरोदर स्त्रीयांना माती खाण्याची सवय

बऱ्याच लहान मुलांना माती आणि इतर गोष्टी खाण्याची सवय असते. तर आज आपण पाहूया. या सवयीची कारणं, त्याचे दुष्परिणाम, उपचार आणि याबद्दलच्या गैर समजुती.

    बऱ्याच लहान मुलांमध्ये आणि गरोदर मातांमध्ये ही माती, खडू, पाठीवरची पेन्सिल, क्ले, प्लास्टर, खेळणी इत्यादी गोष्टी चाटण्याची सवय असते. या सवयीला वैद्यकीय भाषेमध्ये ‘पायका’ असं म्हणलं जातं. सगळ्यात आधी पाहूया या सवयीची कारणं काय असू शकतात. सगळ्यात महत्त्वाचे कारण असू शकतं ते म्हणजे शरीरात लोह (आर्यन) ची कमतरता. याच्या बरोबर थोड्या फार प्रमाणात झिंक आणि कॅल्शियमची कमतरता असते. मुख्य कमतरता ही लोहाची असते. ज्यामुळे आपल्याला माती खाण्याची किंवा इतर गोष्टी खाण्याची इच्छा होते.

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    दुसरे कारणं असतं मानसिक तणाव. जेव्हा मानसिक तणाव असतो. तेव्हा शरीराला आनंदायक घटकांची म्हणजेच सिरोटोनिन या केमिकलची गरज असते. हे केमिकल माती, खडू, पेन्सिल यांच्यामध्ये असतं. म्हणून माती किंवा इतर गोष्टी खाणारी व्यक्ती मानसिक तणावाखाली असते.

          माती खाल्ल्यामुळे मातीमधले जे जंत असतात ते पोटात जातात. त्यामुळे पोटात जंतू संसर्ग होतात. डायरियाचा त्रास होऊ शकतो. बऱ्याचवेळा खडू किंवा खडे आतड्यामध्ये अडकल्यामुळे अडथळे निर्माण होऊ शकतो. काही वेळा ऑपरेशनची गरज पडू शकते. या गोष्टीमुळे जेवण कमी होतं. जेवण कमी झाल्याने इतर व्हिटामिन्स आणि घटकांची कमतरता भासू लागते. मग अजून भूक कमी होते. या सगळ्या दुष्परिणामामुळे या सवयीची तातडीने उपचार करण्याची गरज असते.

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    उपचार हे अत्यंत सोपे आहेत. तीन ते सहा महिने लोहाचं औषध घेतले पाहिजे. जर गरोदर स्त्रीया असतील, त्यांनी लोहाच्या गोळ्या घेतल्या पाहिजे आणि लहान मुले असतील तर त्यांनी लोहाचे टॉनिक घेतले पाहिजे. प्रति किलो ६ मिलीग्रॅम दररोज याप्रमाणात ते दिले जाऊ शकते. अधिक माती खाल्ल्यामुळे पोटात जंत झालेले असतात. जंताचं औषध रोज रात्री तीन दिवस घ्यायचं असतं. यागोष्टीसाठी मुलांच आणि आई-वडिलांचं समुपदेशन ही गरजेचे असतं. माती, खडू व पेन्सिल खाताना मुलांना पकडलं. तर त्याला रागावायचं नाही. त्याला प्रेमाने समजून सांगायचं.

    माती खाणं हे नॉर्मल असतं, असा या सवयीबद्दलचा मोठा गैरसमज आहे. खाण्याची माती ही बाजारात मिळते, असे काही पेशंट सांगतात. पण खाण्याची माती अशी गोष्ट अस्तित्वात नसते. ही सवय आरोग्याला अपायकारक आहे. त्याचा तातडीने उपचार करणं गरजेचे आहे. डॉक्टरांकडून सांगितले जाते की, कॅल्शियमची गरज असतं. पण खरंतर लोहाची गरज असते. माती खाण्याची सवय ही आपल्या देशात कित्येक लोकांना आहे. त्यामुळे त्वरित उपचार करा.    

बच्चों को विटामिन डी की जरुरत

कोरोना से बचने के लिए और इम्युनिटी पावर अच्छी करने के लिए बडे व्यक्तीओं को विटामिन डी कैसे लेना है| यह मैंने बताया है| अभी छोटे बच्चों को भी जन्म के पहले दिन से विटामिन डी जरुरत होती है| विटामिन डी कैसे देना है और क्यू देना है, यह आज आपको बताऊँगा| छोटे बच्चे जो माँ का दूध पिते है| उनके लिए विटामिन डी का एकही सोर्स है, सुरज की रोशनी| पर छोटे बच्चों को आधा घंटा सुरज की रोशनी में रखना बहूत मुश्कील होता है|

    माँ का दूध बाकी सब चीजों में पर्याप्त है| लेकिन माँ के दूध में भी विटामिन डी नही होता है| या कम होता है| इसीलिए छोटे बच्चों को जन्म से लेके पहले जन्मदिन तक हररोज ४०० आययू (इंटरनॅशनल युनिट) विटामिन डी देना जरुरी है| जन्म से लेके देढ़ दो महिने तक के बच्चों के लिए विटामिन डी बढ़ाने का प्राकृतिक मार्ग में आज समजाता हूँ| लखनौ में यह संशोधन हुआ है, जब हम बच्चों को नेहलाते है| तो उन्हे दस बजे के बाद खुली हवा और सुर्य का प्रकाश शरीर पर पडे तो कुछ मात्रा में विटामिन डी मिल सकता है|

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    छोटे बच्चों में उनकी बढती हुई आयू होती है| इसमें मांसपेशीयाँ, हड्डी की वाढ़ का समय होता है| इसमे विटामिन डी बहूत जरुरी होता है| अगर छोटे बच्चों को विटामिन डी ना मिले तो| उनकी हड्डीयों में रिकेडस् नाम की बीमारी होती है| मतलब विटामिन डी ना मिलने से बच्चों की मांसपेशीया और हड्डी कमजोर होती है| जीन बच्चों में बचपन में विटामिन डी कम होता है| उनकी जवानी और बुढापे में असर पडके उनकी हड्डीया कमजोर होती है|

    एक साल के बाद हर हफ्ते ६०००० आययू (इंटरनॅशनल युनिट) एक पॅकेट और बॉटल में ६०००० आययू होता है| तो आप इस डोस से ना डरे| हर हफ्ते में एक बार देना है ६ हफ्ते तक| इसके बाद हर तीन महिने में एक बार ६०००० आययू देना है| दवा देने से विटामीन डी जादा होगी तो यह सोचकर टेन्शन ना ले| इससे हड्डीया और मांसपेशीया मजबूत होगी| पर कोरोना की इस दौर में इम्युनिटी बढेंगी और श्वसन मार्ग की जितनी भी बीमारीयाँ होती है| इसमे विटामीन डी बच्चे की रक्षा करेगा|

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    अस्थमा और बार-बार सर्दी-खाँसी होती है| सीटी के तरह आवाज आती है| दमे के तकलीफ में विटामिन डी बहूत जरुरी होता है| ऐसे बहुत से लाभ विटामिन डी से होते है| ८० से ९० प्रतिशत बच्चों में विटामिन डी की कमी होती है| जैसे कोरोना की महामारी है, वैसे विटामिन डी की कमी की महामारी अपने बच्चों में, जवानों में और बुढों में है| विटामिन डी की कमी की महामारी को हम सब मिटा सकते है|

कोरोना से बचा सकता है विटामिन डी

कोरोना से बचने के लिए जो भी पॉसिबल है| वो सब हम कर रहे है| लेकिन और एक चीज है जो करने से जरुर हमारा कोरोना से बचाव होगा| वो चीज है विटामिन डी का सेवन करना| मैं यह दावा नही कर रहा हूँ की, विटामिन डी लेने से आपको कोरोना होगा ही नही| लेकिन विटामिन डी लेने के बाद अगर आपको कोरोना बाधित व्यक्तीसे संपर्क आता है| तो आपकी इम्युनिटी अच्छी होने के वजह से आपको कोरोना होने के चान्सेस कम रहेंगे| अगर आपको कोरोना का संसर्ग हो भी जाता है| तो जिस इन्सान के शरीर में विटामिन डी की लेवल नॉर्मल है| उसका शरीर कोरोना से लढ़ने के लिए ज्यादा सक्षम होगा| उसपर और इसके फेपडों पर कोरोना का परिणाम कम होगा| और इसके चलते कोरोना से मृत्यू नही होगा|

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    अगर आपके शरीर में विटामिन डी पर्याप्त मात्रा में है| तो कोरोना होने के बावजूद लक्षण ही ना आये| ऐसे हो सकता है| या बहूत ही मामुली लक्षणों के बाद कोरोना ठीक हो जाए| कोरोना को टालने के लिए या कोरोना से बचने के लिए विटामिन डी कैसे काम करता है| श्वसन मार्ग के सभी जंतू संसर्ग मामुली सर्दी खाँसी से लेके निमोनिया तक सब जंतू संसर्ग रोखने के लिए| विटामिन डी का रोल बहुत महत्त्वपूर्ण है| जिनको अस्थमा और दमा की तकलीफ है| उन्हे विटामिन डी दिया जाये| तो अस्थमा की तकलीफ कम हो जाती है| और अस्थमा के अँटक कम आते है| हमारे देश में ९० प्रतिशत लोगों में विटामिन डी की कमी है| इसका कारण यह है की, खाने के सोर्स से विटामिन डी नही मिलता है| सिर्फ सुर्य प्रकाश से ही विटामिन डी मिलता है| सुबह १० से दोपहर ४ बजे तक आधा घंटा कम से कम कपडों में धूप में खडे रहेंगे या चलेंगे| यह भी हम करते है, तभी भी विटामिन डी पर्याप्त मात्रा में नही मिलता है| क्यूँ की हमारी त्वचा युरोपिय लोगों से काली है| काली त्वचा के वजसे सुरज की रोशनी मिलने के बावजूद विटामिन डी हमारे शरीर में घुस नही जाता है| कई सालों से हमारे देश में विटामिन डी की कमी की महामारी चल रही है|

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    इस महामारी को भगा ने के लिए विटामिन डी लेना जरुरी है| हर व्यक्ती को ६०००० आययू (इंटरनॅशनल युनिट) विटामिन डी लेना है| आपको हफ्ते में १ बार ८ हफ्तों के लिये लेना है| ८ हफ्ते होने के बाद हर महिने में ६०००० आययू विटामिन लेना है| खाना खाने के बाद विटामिन डी लेना है| खाली पेट विटामिन डी लेना नही है| विटामिन डी यह चरबी में पिघलनेवाला विटामिन है| इसलिए खाना खाने के बाद विटामिन डी लेने से पुरी आतो में शोषित हो जाता है| मांसपेशीया और हड्डी को मजबूत करने के लिए विटामिन डी जरुरी होता है| अगर आपकी गर्दन दर्द हो रही है| तो आपको विटामिन डी जरुरी है| विटामिन डी की कमी की महामारी को मिटाने के लिए सहयोग दिजिए|   

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किडनी स्टोन रुग्ण के लिए ७ डाइट टीप्स

किडनी स्टोन का इलाज करने के बाद भी दुबारा किडनी स्टोन होने के चान्सेस होते है| इसमें डाइट का महत्त्वपूर्ण रोल है| तो मैं आज आपको ७ डाइट टीप्स बताऊँगा|

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    पहली टीप्स बहुत जादा पानी पीना| दुसरी टीप्स खाने में जादा कॅल्शियम और बहुत जादा ऑक्झलेट जिसकी वजसे स्टोन बनते है| ऐसी खाने की चीजे डाइट में नही होना चाहिये| तिसरी टीप्स एक्स्ट्रा कॅल्शियम की गोलीयाँ ना खाये| डाइट में जितना कॅल्शियम मिलता है, उतना ही पर्याप्त है| चौथी टीप्स आपके डाइट में प्रोटीन की मात्रा| आपके डाइट में प्रोटीन की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिए| लेकिन बहुत ज्यादा प्रोटिन होना किडनी स्टोन के पेशंट के लिए खतरनाक हो सकता है| और किडनी स्टोन बनाने के लिए जिम्मेदार हो सकता है| प्रोटिन पावडर बिल्कुल ना ले|

पाचवी टीप्स आपके डाइट में कॅल्शियम योग्य मात्रा में होना चाहिए, परंतु कॅल्शियम बिल्कुल भी नही होना चाहिए, ऐसे नही है| लोगों के मन में एक गलत फैमी है की, किडनी स्टोन के पेशंटने कॅल्शियम डाइट नही लेना चाहिए| हरी सब्जी, दुध के पदार्थ इसमे कॅल्शियम होता है| और ये चीजे कम मात्रा में खानी चाहिए| छठवी टीप्स विटामीन सी की गोलीयाँ नही खानी है| विटामीन सी ज्यादा लेने पर किडनी स्टोन बनने का कारण बन सकता है| आप रोज खाना खाते है, उसमे विटामीन सी पर्याप्त होता है| नींबू, मोसंबी, संत्रे इसमे विटामीन सी होता है| ये सब खा सकते है, पर विटामीन सी की गोलीयाँ ना खाये| सातवी टीप्स आप अपने डाइट में नमक कितना ले रहे है, ये भी महत्त्वपूर्ण है| ज्यादा नमक खाना इसमे सोडियम होता है, और ये किडनी स्टोन बनाने के लिए कारण बन सकता है| तो आप एक्स्ट्रा टेबल सॉल्ट कभी भी ना ले| ये सात टिप्स का पालन करो और किडनी स्टोन से मुक्त हो जाओ|

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किडनी स्टोन हो तो क्या खाना चाहिए

जिन को किडनी स्टोन है, तो क्या खाना चाहिए| हररोज नारियल का पानी एक या दोन ग्लास पी सकते है| मक्का भी ज्यादा खा सकते है| राईस या मुरमुरे, अननस, केला, बादाम, नींबू, गाजर, करेले की सब्जी खा सकते है| बहुत ज्यादा पानी पीना चाहिए|

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    मुरमुरे नाश्ते मे खा सकते है और उसमे प्रोटीन जादा होता है| केले मे पोटॅशियम होता है, इसलिए केला भी खाना जरुरी है| बादाम खाते वक्त उपर का छिलका निकालने ना भूले| किडनी स्टोन के पेशंट को नींबू खाना बहुत लाभदायक है| उसमे अल्कलाईन होता है|

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किडनी स्टोन हो तो क्या खाना नही चाहिए

किडनी में पत्थर होना यह आम स्वास्थ की बीमारी है| जिन को किडनी स्टोन है| या दुबारा किडनी स्टोन ना हो| इसलिए खाने में क्या नही खाना चाहिए|

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    ऑक्सलेट स्टोन और युरीन अँसिड स्टोन यह किडनी स्टोन के दो मुख्य प्रकार है| खाने के चीजों से ऑक्झलेट और युरिन अँसिड की मात्रा बढ़ जाती है| इसलिए किनडी स्टोन तैयार होते है|

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    पालक, लौकी, टमारटर, आँवला, चिकू, काजू, ककडी, मनके यह चीजे नही खानी चाहिए| कोबी, कद्दू, मशरूम, बैंगण की सब्जी इसके अलावा जो दूध के पदार्थ है| यह सब चीजे कम मात्रा में खानी चाहिए| मांसाहार भी बंद करना चाहिए| नमक कम मात्रा में खाना चाहिए| जादा नमक खाने से किडनी स्टोन बढ़ने के चान्सेस जादा होते है| तो ‘नो एक्स्ट्रा टेबल साल्ट’ कभी भी ना ले|

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https://www.youtube.com/watch?v=NO1Dn34r9y0

वर्कआऊट के बाद मसल्स दर्द होता है?

अगर आप बहोत दिनों बाद पहाड़ चढ़ रहे है या ट्रेकपर जा रहे हो| आपने नया-नया जीम जॉईन किया है, वेट लॉस कर रहे है| तो आप में से कही लोगोंने आपके मसल्स में अलग प्रकार का पेन होता है| जो एक हफ्ता या देढ़ हफ्ता चलता है और बाद में चला जाता है| इसे हम मेडिकल भाषा में ‘डिलेड ऑनसेट ऑफ मसल्स सोरनेस’ कहते है| जब आप जीम नया जॉईन करते है| तो कोई नये लोग होते है वो जीम आधे में ही छोड देते है|

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    मसल्स सोरनेस के मुख्य दो कारण क्या है? इसका पहले कारण जब आप वेट ट्रेनिंग करते है| कही दिनों से जो आपके अनयुज्ड मसल्स है ओ भी काम करना शुरू करते है| मसल्स पर तणाव आता है| इनको एनर्जी देने का काम ग्लायकोजन नाम का पदार्थ शरीर में करता है| ये ग्लायकोजन जब ब्रेक होता है| तो इसमें से लॅक्टिक अँसिड नाम का पदार्थ बाहर आता है| हमारे शरीर में लॅक्टिक अँसिड जमा होता है, इसलिए हमको मसल्स में दर्द होता है| जैसे हम कार्डिओ करते है| इसमें आमतौर पर ये नही होता है| मसल्स पे कुछ तणाव है| तभी लॅक्टिक अँसिड तयार होता है|

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    दुसरा कारण मसल्स पर तणाव आता है| तब ओ थोडेसे ब्रेक होते है| तुटते है तो दर्द देते है| जब वो तुटेंगे फिरसे रिग्रो करेंगे तभी मसल्स ग्रोथ होता है| तो आपके मसल्स में दर्द होता है| तो यह एक अच्छा लक्षण होता है| दर्द होगा तो समझिए आपका एक्सरसाइज सही तरीके से हो रहा है| जब मसल्स ब्रेक होते है| तब भी इनमें से ग्रोथ हार्मोन और टेस्टोस्टरॉन हार्मोन रिलीज होता है| ग्रोथ हार्मोन और टेस्टोस्टरॉन हार्मोन पुरे शरीर को काम आता है|

    मसल्स सोरनेस के लिए सबसे पहिला उपाय है| जीम शुरू करने से पहिले वार्मअप करना और खतम होने के बाद स्ट्रेच करना| पाच- पाच मिनीट समय देंगे| तो शुरूवात में मसल्स सोरनेस कम होगा| दुसरा उपाय है, अगर आप शाम को या किसीभी टाईम को एरोबिक एक्टिव्हिटी करेंगे| उसके बाद लॅक्टिक अँसिड निकल जायेगा और आपका दर्द अपने आप कम हो जायेगा|

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तिसरा उपाय है, जीम होने के बाद १० या १५ रुककर ठंडे पानी से नहाये| साधा पानी से नहाने के बाद मसल्स दर्द होना कम होगा| चौथा उपाय है, अच्छी नींद लेना| पहिला बार जीम जॉइन कर रहे हो तो रात को ८ घंटा नींद लेना जरुरी है| नींद इस दर्द का सबसे अच्छा इलाज है| पाचवा उपाय है, प्रोटीन का सेवन करना| दिन में दो से तीन नींबू पानी का सेवन करना| ये भी शरीर का मसल्स सोरनेस कम करने का काम करता है| छटा उपाय है, आप अलग-अलग दिन अलग अलग मसल्स ग्रुपस् को ट्रेन करे|

    मसल्स सोरनेस होता है तो क्या नही करना चाहिए| ये सबसे जादा महत्त्वपूर्ण है| कुछ लोक एक दिन ब्रेक लेकर एक्सरसाइज करते है| तो एक्सरसाइज नही रोखना ये भी एक मसल्स सोरनेस का एक उपाय है| वर्कआऊट से पहले जो दर्द होता है वो वर्कआऊट से ही चला जायेगा|       

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कोरोनाचा नवा ओमिक्रॉन व्हेरिअंट दारात उभा… आता?

Corona's new Omicron variant standing in the doorway ... nowCorona's new Omicron variant standing in the doorway ... now

२६ नोव्हेंबर रोजी जागतिक आरोग्य संघटनेने ओमिक्रॉन या कोरोनाच्या नव्या संक्रमित प्रजातीला ‘व्हेरिअंट ऑफ कन्सर्न’ म्हणजे नोंद घेण्याजोगी प्रजाती म्हणून जाहीर केले आहे. दक्षिण आफ्रिका व युरोपसह नऊ  देशांमध्ये सध्या या नव्या प्रजातीमुळे नव्याने कोरोनाचे रुग्ण मोठ्या प्रमाणावर आढळण्यास सुरुवात झाली आहे. भारतात पहिली लाट ओसरल्यावर कोरोना संपल्याचा उत्सव सुरु होता, तेव्हा डेल्टाचे रुग्ण अमेरिका, इंग्लंड, युरोपमध्ये आढळण्यास सुरुवात झाली व त्यावेळच्या गाफीलतेतून मार्च महिन्यात भारतात दुसरी लाट आली.  आता भारतात काळजी वाऱ्यावर सोडून दिलेली असताना  हा ओमिक्रॉन व्हेरिअंट आला आहे.

कोरोनामध्ये अशी संक्रमणे अपेक्षित असली, तरी ओमिक्रॉनच्या संक्रमणामध्ये काहीसा वेगळेपणा आहे. अल्फा व डेल्टा ही भावंडं निर्माण झाली तेव्हा कोरोना विषाणूमध्ये दोन ते तीन ठिकाणी जनुकीय बदल झाले होते. पण ओमिक्रॉन मध्ये तब्बल ३० ठिकाणी अशी म्युटेशन्स झाली आहेत. त्यामुळे हे संक्रमण आधीपेक्षा जनुकीयदृष्ट्या जास्त घातक आहे. अशा संक्रमणामुळे एक तर विषाणू जास्त लोकांना संक्रमित करण्यास सक्षम होतो आणि लसवंत व्यक्तिलाही संसर्गित करू शकतो. अर्थात, असे होईलच, असेही नाही. कारण संक्रमण घातक ठरेल की, विषाणूला माघार घ्यावी लागेल, हे मानव समूह म्हणून त्याला कसा प्रतिसाद देतो व सार्वजनिक आरोग्याची त्या विरोधात धोरणे कशी असतात, यावरून ठरते.

डॉ. अमोल अन्नदाते यांचे लेख वाचा

अर्धवट लोकसंख्येला कोरोना संसर्गामुळे मिळालेली अर्धवट प्रतिकारशक्ती व अजून सर्व लोकसंख्येचे न झालेले लसीकरण अशा सामूहिक प्रतिकारशक्तीची ‘ ना घर का, ना घाट का’ स्थिती ओमिक्रॉनच्या आक्रमणासाठी एक आदर्श स्थिती आहे. आज देशात केवळ ३१ टक्के लोकांचे पूर्ण लसीकरण झाले आहे. २६ टक्के लोकांनी एक डोस घेतला असून, दुसरा डोस घेणे बाकी आहे. दुसरा डोस न घेतलेल्यांपैकी १०० दशलक्ष भारतीयांनी दुसऱ्या डोसची वेळ येऊनही हा डोस घेतलेला नाही. दुसऱ्या डोसची वाट पाहणारे व तारीख उलटूनही न घेणारे हे दोन गट भारताला ओमिक्रॉनच्या तोंडी  देऊ शकतात. अजून लसीकरणच न झालेले ४३ टक्के भारतीय हे तर ओमिक्रॉनसाठी सर्वात सोपे सावज!

संक्रमण कुठलेही व कितीही घातक असो पूर्ण लसीकृत देश हेच त्याला उत्तर असणार आहे. म्हणून लसीकरणाची गती अजून वाढवणे, मुदत उलटून गेलेल्यांना शोधून तो देणे व पहिला डोस झालेल्यांना त्याच तारखेला डोस देणे, यासाठी तीन पातळ्यांवर काम करणारे आरोग्य सेवकांचे गट व स्वतंत्र कृती आराखडे तयार करणे गरजेचे आहे. याशिवाय दुसरा डोस घेऊन सहा महिने होऊन गेलेल्यांना तिसरा बुस्टर डोस देण्याच्या निर्णयालाही काहीसा उशीर होतो आहे. जगात ३६ देशांमध्ये तिसरा डोस देण्यास सुरुवात झाली आहे. ओमिक्रॉनच्या पार्श्वभूमीवर ६०पेक्षा जास्त वय असलेले, इतर आजार असलेले व पहिल्या फळीत काम करणारे आरोग्यसेवक या तीन गटांना बुस्टर डोसचा निर्णय सरकारने लवकरात लवकर घ्यावा. ओमिक्रॉनचे अस्तित्व असलेल्या सर्व देशातून भारतात येणाऱ्या लोकांना १४ दिवस ठराविक ठिकाणी (गृह नाही) विलगीकरण, तपासणी अनिवार्य करणे गरजेचे आहे.  कोरोना रुग्णांचे जनुकीय वर्गीकरण वाढवून त्यात ओमिक्रॉन आढळतो का, याची सतत चाचपणी आवश्यक आहे. एवढे नुकसान झाले तरीही, मास्क, हात, धुणे व शारीरिक अंतर  या तीन मूलभूत गोष्टी जीवनशैलीचा भाग बनवण्यास आपण तयार नाही. ओमिक्रॉन अजून किती घातक ठरेल, हे काळच ठरवेल. पण त्यादृष्टीने आरोग्य सुविधांची तत्परता, बंद केलेले कोविड सेंटर्स कधीही सुरु करता येतील, अशी तयारी व औषधांचा पुरेसा साठा या बाबींकडे लक्ष देणे आवश्यक आहे. दुसरी लाट येण्याआधीची गाफीलता व दुसऱ्या लाटेदरम्यान झालेल्या चुका टाळून ओमिक्रॉनचा मुकाबला करावा लागेल.

सदरील माहिती आपण लोकमत मध्येही वाचू शकता.

डॉ. अमोल अन्नदाते

पालकांच्या मनातला भीतीचा अडथळा कसा ओलांडणार?

how-to-overcome-the-fear-barrier-in-the-minds-of-parents

मुलांना संसर्ग होऊन गेला असेल, तर मग लस कशासाठी? – असा प्रश्न विचारणाऱ्या पालकांना ‘लसवंत मुले म्हणजे सुरक्षित घर’ हे पटवून द्यावे लागेल!

कोव्हॅक्सिन लसी लहान मुलांना देण्यासाठी परवानगी देण्यात आली आहे. देशातील एकूण लोकसंख्येपैकी  ३५.३ % हिस्सा हा ०- १४ व ४१ % ० ते १८ वयोगटाचा असल्याने कोरोना महामारीचे नियोजन हे लहान मुलांच्या लसीकरणाशिवाय पूर्ण होऊ शकत नाही. म्हणून लहान मुलांसाठी लसीला परवानगी मिळणे महत्त्वाचे आहे; पण परवानगी मिळणे व देशातील प्रत्येक मुलापर्यंत लस पोहोचणे यातील अंतर मोठे आहे.

लहान मुलांसाठी लसीकरण मोहीम राबविताना सगळ्यात मोठे आव्हान असणार आहे – पालकांच्या मनातील भीती दूर करणे. मोठ्या व्यक्तींसाठी लसीकरण मोहीम सुरू होऊन १० महिने उलटून गेले; पण अजून मोठ्यांमध्ये भीती व गैरसमजांमुळे लस न घेतलेल्यांची संख्या बरीच आहे. लसीची परिणामकारकता व सुरक्षितता सिद्ध होऊनही अजून लसीच्या भीतीचे  पूर्ण उच्चाटन झालेले नाही. म्हणून बालरोगतज्ज्ञ, शाळा, शिक्षक व राजकीय, सामाजिक नेत्यांना प्रत्येक पालकाला आपल्या पाल्याला लस देण्यासाठी प्रेरित करणारी वेगळी सामाजिक मोहीम राबवावी लागणार आहे. सिरोर्व्हेप्रमाणे देशातील ५० ते ६० % लहान मुलांना हा संसर्ग होऊन गेला आहे. मग कोरोना संसर्ग होऊन गेला असताना लस कशासाठी,  असा प्रश्न पालक विचारत आहेत. संसर्ग होऊन गेला असला तरी कोरोना हा कांजण्याच्या आजाराप्रमाणे आयुष्यभर कायमची प्रतिकारशक्ती बहाल करीत नाही. तसेच नव्या व्हेरियंटस्ने परत संसर्ग होऊ शकतो.  कोरोनाच्या नैसर्गिक संसर्गापेक्षा लस शाश्वत व दीर्घकालीन प्रतिकारशक्ती देते.

५० ते ६० % मुलांना कोरोना होऊन गेला असे म्हटले  तरी ही ५० % मुले कोण हे शोधण्यासाठी प्रत्येकाची रक्त तपासणी करणे जिकिरीचे आहे. लहान मुलांमध्ये कोरोना सौम्य स्वरूपाचा असतो व मृत्युदर अत्यंत कमी आहे; पण तो अगदी शून्य नाही हे लक्षात घेता लहान मुलांना लस आवश्यक आहेच. बालमृत्यूची अनेक कारणे आ वासून उभी असताना त्यात कोरोनाच्या कारणाची भर परवडणारी नाही. लहान मुलांमध्ये कोरोनाचा आजार गंभीर नसला तरी एमआयएससी ही संसर्ग संपल्यावर चार आठवड्यांनी काही मुलांमध्ये होणारी गुंतागुंत जीवघेणी ठरत आहे व याचे उपचारही महागडे आहेत. हे टाळण्यासाठी लसीकरण हाच उपाय आहे. सौम्य आजार असला तरी लहान मुले घरातील इतर मोठ्या व्यक्तींना व त्यातच आजी-आजोबांसाठी संसर्गाचा महत्त्वाचा स्रोत आहे. दुसऱ्या लाटेनंतर मुलांचा घराबाहेर वावर वाढला आहे व  लक्षणविरहित मुले  सुपर स्प्रेडर ठरत आहेत. हे लसीकरण करण्याचे एक मोठे कारण आहे.

‘लसीकृत/लसवंत मुले म्हणजे सुरक्षित घर’ अशी नवी घोषणा आता लहान मुलांच्या कोरोना लसीकरणाबाबतीत शासनाने द्यावी. पहिल्या टप्प्यात हृदयाचे आजार, किडनीचे आजार, कॅन्सर, थॅलेसिमियासारखे रक्ताचे आजार, मतिमंद व मानसिकदृष्ट्या विकलांग व दिव्यांग मुलांना प्राधान्य देऊन लसीकरण सुरू करावे. यानंतर गरोदर मातांच्या मुलांना व तिसऱ्या टप्प्यात सर्व मुलांना अशा प्रकारे लसीकरण मोहीम पूर्ण करता येईल. वयोगटाच्या बाबतीत आधी १० ते १८ व त्यानंतर २ ते १० वर्षे असे प्राधान्यक्रम ठरविता येतील. २ ते ७ वर्षे वयोगटाला लस देणे हे बालरोगतज्ज्ञांचे विशेष कौशल्य आहे. या वयोगटासाठी देशभरातील बालरोगतज्ज्ञांची मदत घेत झपाट्याने लसीकरण होऊ शकते. कारण इतर लसीकरणासाठी रोज अनेक बालके बालरोगतज्ज्ञांकडे येतात. त्यावेळी आधी कोरोनाची लस व त्यानंतर इतर लसी अशी विनंती बालरोगतज्ज्ञ  पालकांना करू शकतात. 

लहान मुलांच्या बाबतीत मात्र लसीची किंमत कमी करून जास्तीत जास्त खाजगी बालरोगतज्ज्ञांना या मोहिमेत सामावून घेतल्यास लहान मुलांच्या लसीकरणाचे प्रमाण वाढेल. त्यासाठी सध्या खाजगी रुग्णालयाला लसीकरणाची परवानगी व लस साठा मिळविण्याची किचकट प्रक्रिया सोपी करावी लागेल. जोपर्यंत प्रत्येक जण सुरक्षित नाही तोपर्यंत कोणीही सुरक्षित नाही या तत्त्वाला अनुसरून हर्ड इम्युनिटी मिळविण्यासाठी लहान मुलांचा लसीकरण कार्यक्रम तातडीने राबवावा लागेल.

डॉ. अमोल अन्नदाते
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“नीट’ नेटके करण्यासाठी…

नीट' नेटके करण्यासाठी...

-डॉ. अमोल अन्नदाते

“नीट’ नेटके करण्यासाठी… तमिळनाडूचे मुख्यमंत्री स्टॅलीन यांनी त्यांच्या राज्यात “नीट’ परीक्षा रद्द करून वैद्यकीय प्रवेशाचे सर्व हक्क हे राज्य सरकारांना देण्याविषयी मोहिम सुरू केली असून बिगर भाजप शासित १३ राज्यांच्या मुख्यमंत्र्यांना “नीट’ रद्द करण्याच्या मागणीला पाठींबा देण्याची विनंती केली आहे. हा विषय जसा शैक्षणिक आहे तसाच राजकीय देखील आहे आणि स्टॅलीन यांची भूमिका योग्य की अयोग्य हे समजून घेण्यासाठी “नीट’ ही राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा सुरु का झाली याबरोबरीने वैद्यकीय प्रवेशाच्या बाबतीत प्रांतवादाचा इतिहास तपासून पाहणेही तितकेच गरजेचे आहे.

तमिळनाडूचे मुख्यमंत्री स्टॅलीन यांनी “नीट’ परीक्षा रद्द करून वैद्यकीय प्रवेशाचे सर्व हक्क हे राज्य सरकारांना देण्याविषयी तमिळनाडूच्या विधानसभेत ठराव संमत करून घेतला आणि बिगर भाजप शासित १३ राज्यांच्या मुख्यमंत्र्यांना नीट रद्द करण्याच्या मागणीला पाठींबा देण्याची विनंती केली आहे. “नीट’ मुळे ग्रामीण तसेच वंचित घटकांच्या विद्यार्थ्यांना समान संधी मिळत नाही आणि “नीट’ची कठीण्य पातळी ग्रामीण भागातील विद्यार्थ्यांना शिक्षणाच्या समान संधी मिळत नसल्याने वैद्यकीय प्रवेशांच्या बाबतीत अन्याय करणारी आहे असा तमिळनाडू सरकारचा दावा आहे. हा विषय जसा शैक्षणिक आहे तसाच राजकीय देखील आहे आणि स्टॅलीन यांची भूमिका योग्य की अयोग्य हे समजून घेण्यासाठी “नीट’ ही राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा सुरु का झाली याबरोबरीने वैद्यकीय प्रवेशाच्या बाबतीत प्रांतवादाचा इतिहास तपासून पाहणेही तितकेच गरजेचे आहे.

दक्षिणेकडील राज्ये ही नेहमीच प्रांतवादाचा समर्थन करत आली आहेत. तिथल्या राजकारणाचा गाभाच प्रांतवादाचा आहे. लोकसंख्येच्या तुलनेत सर्वाधिक वैद्यकीय महाविद्यालये ही महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना आणि तमिळनाडू या चार राज्यांमध्ये आहेत. म्हणूनच दक्षिणेतील राज्य आम्हाला इतर राज्यात प्रवेश नको आणि आम्हीही इतर राज्यातील विद्यार्थ्यांना प्रवेश देणार नाही अशी भूमिका आळवत आले आहेत. “नीट’ प्रवेश परीक्षा सुरु होण्याआधी प्रत्येक राज्य त्यांच्या शासकीय प्रवेशासाठी वेगळी परीक्षा तर घेत असतच याशिवाय एम्स, पिजीआय चंडीगड, माहे-मणिपाल, जीपमेर-पॉंडीचेरी, सीएमसी-वेल्लोर, अलीगड मुस्लीम विद्यापीठ, बनारस हिंदू विद्यापीठ, आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कॉलेज ही देशभर पसरलेली वैद्यकीय शिक्षणाच्या दर्जासाठी नावाजलेली विविध शासकीय संस्था वैद्यकीय प्रवेशासाठी त्यांच्या त्यांच्या स्वतंत्र परीक्षा घेत असत. या शिवाय देशभरातील विविध अभिमत विद्यापीठेदेखील त्यांच्या स्वतंत्र परीक्षा घेत असत. महराष्ट्रात तर यात अजूनच गोंधळ होता. महराष्ट्रातील १२ अभिमत विद्यापीठे त्यांच्या स्वतंत्र परीक्षा घेताना त्या विद्यापीठांच्या शाखाही परत वेगळ्या परीक्षा घेत असत. म्हणजे डी वाय पाटील विद्यापीठाच्या पुणे, मुंबई, कोल्हापूर या तीन ठिकाणी असलेल्या कॉलेजसाठी हे विद्यापीठ तीन वेगवेगळ्या परीक्षा घेत. म्हणजे राज्यातील एका विद्यार्थ्याला एका महिन्यात २० ते २५ प्रवेश परीक्षांचा पर्याय होता. तसेच अभिमत विद्यापीठांच्या प्रवेश परीक्षा ते स्वतःच घेत असल्याने त्यांच्या पारदर्शकतेवर ही वेळोवेळी शंका उपस्थित होत असे. यामुळे अनेक वर्षे ‘वन नेशन-वन एक्झाम‘ म्हणजेच सर्व प्रवेशांसाठी एकच परीक्षेची मागणी अनेक वर्षे होत होती. ती अखेर “नीट’च्या रूपाने पूर्ण झाली ज्यामुळे किमान विद्यार्थ्यांची अनेक परीक्षा देण्याची धावपळ तरी थांबली.

ज्या दोन प्रश्नांवरून सध्या “नीट’ रद्द करण्याची मागणी जोर धरू लागली आहे त्याची उत्तरे शोधण्याचा प्रयत्न करू या. “नीट’ रद्द करण्याचा पहिला युक्तिवाद आहे की या राष्ट्रीय परीक्षेमुळे घटनेने राज्य सरकारला दिलेल्या अधिकारांवर गदा येते आहे. परंतू परीक्षा राष्ट्रीय असली तरी वैद्यकीय प्रवेश प्रक्रिया ही संबंधित राज्यातील वैद्यकीय शिक्षण संचलनालयच करते आणि प्रत्येक राज्यातील ८५ % जागा या त्या राज्यातील विद्यार्थ्यांसाठी राखीव असतात. केवळ १५ % जागेवर इतर राज्यातील विद्यार्थ्यांना प्रवेश असल्याने राज्याच्या हक्कांवर फार मोठी गदा येते आहे असे मुळीच नाही. या १५ % जागा ही आम्हाला द्यायच्या नाहीत हे राज्यांनी म्हणणे दुराग्रही आहे कारण त्याने देशभरतील इतर दर्जेदार महाविद्यालयांची दारे आपल्याच राज्याच्या विद्यार्थ्यांना कायमची बंद होणार आहेत. महाराष्ट्राचाच विचार करायचा झाला तर इतर राज्याच्या १५ % कोट्यातूनही बरेच महाराष्ट्रातील विद्यार्थी परत महाराष्ट्रातच प्रवेश मिळवतात तसेच इतर राज्यातही १५ % कोट्यातून प्रवेश मिळवणाऱ्या आपल्या विद्यार्थ्यांची संख्या विपुल आहे. म्हणून किमान आपल्या राज्यासाठी तरी “नीट’ फायदेशीर आहे.

“नीट’ नेटके करण्यासाठी… दुसरा महत्वाचा प्रश्न आहे “नीट’ची कठीण्य पातळी आणि यात ग्रामीण-वंचित घटकांच्या विद्यार्थ्यांचे होणारे नुकसान. हे टाळण्यासाठी “नीट’ परीक्षा मराठीसह एकूण १३ स्थानिक भाषेत घेतली जाते. तरीही काही ग्रामीण भागातील विद्यार्थी या परीक्षेतील पात्रता असूनही यश मिळवू शकत नाहीत. पण याचा संबंध हा “नीट’ परीक्षेपेक्षाही ग्रामीण भागातील शैक्षणिक संधी व त्याची गुणवत्ता उंचावण्याशी आहे. मी स्वतः माध्यमिक शिक्षण तालुका पातळीवर पूर्ण करून पुढे लातूरसारख्या ग्रामीण भागात निर्माण झालेल्या “लातूर पॅटर्न’मधून बारावीला राज्यात सर्व प्रथम आलो आणि पीसीबी ग्रुप मध्ये ९९.९ टक्के गुण मिळवले. यावरून हे सिद्ध होते की ग्रामीण भागात जर शिक्षणाच्या उत्तम संधी निर्माण झाल्या तर कुठलाही विद्यार्थी आर्थिक, स्थानिक, ग्रामीण अशा भेदभावामुळे वंचित राहणार नाही. आज ही लातूरचे विद्यार्थी सातत्याने “नीट’ मध्ये यश मिळवण्यात आघाडीवर आहेत. अहमदपूर, नांदेड, अंदूरचे आलुरे गुरुजी यांचे प्रयोग, हातवळने बंधू -भगिनी या ग्रामीण भागातून प्रथ्म आलेल्यांची यशोगाथा असे कितीतरी दाखले देता येतील. याला दुसरा पर्याय म्हणजे तालुका पातळीवर शिक्षण घेत असलेल्या विद्यार्थ्याला किंवा ग्रामीण भागातील विद्यार्थ्याला राज्य सरकार त्यांच्या राज्यात काही जागा राखून ठेवू शकतात. पण जागा राखून ठेवणे आणि “नीट’ मधून अंग काढून घेणे हे या विद्यार्थ्यांसाठी तात्पुरती मलमपट्टी ठरू शकते. गुणवत्तापूर्ण शिक्षणाची ज्ञानगंगा व शैक्षणिक संधी शेवटच्या घटकापर्यंत घेऊन जाणे हेच यावर दूरगामी व शाश्वत उत्तर आहे. “नीट’ मधून अंग काढून आपण वैद्यकीय प्रवेशापुरता प्रश्न मार्गी लावू पण आयआयटी, जेईई, स्पर्धा परीक्षा, प्रदेशातील युएस एमएमई, प्लॅब, इसीएफएमजी, जीआरई या परीक्षांच्या बाबतीत आपण काय भूमिका घेणार आहोत? विद्यार्थ्याला स्वतःच्या राज्यापुरते मर्यादित ठेवून त्याला आपण शैक्षणिक दृष्ट्या संकुचित राहण्याची आणि इतर आंतरराष्ट्रीय स्पर्धेपासून अंग चोरण्याची सवय लावणार आहोत हे विसरून चालणार नाही.

“नीट’ नेटके करण्यासाठी… जर वैद्यकीय प्रवेशासाठी प्रांतवादाचा मुद्दा रेटायचाच असेल आणि त्या माध्यमातून राज्यातील विद्यार्थ्यांना जास्त जागा उपलब्ध करून द्यायच्या असतील तर त्यासाठी इतर चांगले व सोपे पर्याय आहेत. राज्यातील १२ अभिमत विद्यापीठात २२०० एमबीबीएसच्या जागा आहेत. या सगळ्या जागा पूर्ण देशातील विद्यार्थ्यांना खुल्या आहेत. त्यापैकी १५ % अनिवासी भारतीय व ८५ % देशातील सर्व विद्यार्थ्यांना खुल्या आहे. यात राज्य सरकारने १२ अभिमत विद्यापीठांच्या पातळीवर चर्चा करून काही टक्के जागा या राज्यासाठी मागून घ्याव्या. सर्व १२ विद्यापीठे सहमत झाली तर त्यांची तशी मागणी केंद्र सरकार मान्य करेल आणि यात त्यांचे कुठेही नुकसान होणार नाही. राज्यातील विद्यार्थ्यांना अधिक जागा उपलब्ध होतील. तसेच इतर खाजगी वैद्यकीय महाविद्यालयांच्या १५ % कोटा व्यवस्थापन स्वत: डोनेशन घेऊन भरू शकते. मी माझ्या नर्सिंग महाविद्यालयाच्या सर्व व्यवस्थापनाच्या वाट्याला आलेल्या डोनेशन घेऊन भरण्याच्या जागा स्वेच्छेने राज्य सरकारकडे सुपूर्द करून टाकल्या आहेत. अगदी असे नाही तर या व्यवस्थापनाच्या १५ % पैकी ५० % म्हणजे एकूण ७.५ % जागा या आपल्या राज्यातील विद्यार्थ्यांना (डोनेशन घेऊनच) देण्याचा समझोता राज्य सरकारने खाजगी महाविद्यालयांशी करावा. अशा प्रकारे “नीट’ मध्ये आपले अस्तित्व ठेवून शैक्षणिक गुणवत्ता वाढवत ग्रामीण भागातील विद्यार्थ्यांना सामावून घेणे, “नीट’च्या माध्यमातून इतर राज्यातही आपले विद्यार्थी कसे जास्त पात्र ठरतील यासाठी प्रयत्न करणे व खाजगी वैद्यकीय महाविद्यालये, अभिमत विद्यापीठांशी प्रेमपूर्ण समझोता करत त्यांच्या जास्तीत जास्त जागा राज्यातील विद्यार्थ्यांसाठी पदरात पाडून घेणे ही भूमिका “नीट’ विरोधापेक्षा जास्त समंजसपणाची आणि फायद्याची ठरेल.

– डॉ. अमोल अन्नदाते
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